दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया ने जोर पकड़ लिया है। कांग्रेस सांसद और पार्टी के व्हिप नासिर हुसैन ने सोमवार को पुष्टि की कि राज्यसभा में जस्टिस वर्मा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव का नोटिस दिया गया है। इस प्रस्ताव पर 60 से अधिक राज्यसभा सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं।
इससे पहले लोकसभा में भी इसी मुद्दे पर हलचल देखी गई थी, जहां 145 सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष को ज्ञापन सौंपा था। इसमें न्यायमूर्ति वर्मा को पद से हटाने की मांग की गई थी।
कई दलों का मिला समर्थन
महाभियोग प्रस्ताव को कांग्रेस, तेलुगू देशम पार्टी, जनता दल यूनाइटेड, जनता दल सेकुलर, जनसेना पार्टी, असम गण परिषद, शिवसेना (शिंदे गुट), लोक जनशक्ति पार्टी और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) जैसे कई प्रमुख दलों का समर्थन प्राप्त है।
प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करने वाले प्रमुख नेताओं में राहुल गांधी, अनुराग ठाकुर, रविशंकर प्रसाद, पीपी चौधरी, राजीव प्रताप रूड़ी, सुप्रिया सुले और केसी वेणुगोपाल जैसे वरिष्ठ नेता शामिल हैं।

15 मार्च को जले हुए नोट मिलने का मामला बना वजह
इस पूरे विवाद की जड़ 15 मार्च 2025 की वह घटना है, जब जस्टिस यशवंत वर्मा के दिल्ली स्थित सरकारी आवास से बड़ी मात्रा में नकदी नोट बरामद किए गए थे। रिपोर्ट्स के मुताबिक, इनमें से कुछ नोट आंशिक रूप से जले हुए भी पाए गए थे।
इस घटना के सामने आने के बाद से ही न्यायपालिका की पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर कई सवाल उठाए जा रहे हैं। महाभियोग प्रस्ताव इन्हीं आरोपों की जांच और न्यायिक प्रक्रिया की गरिमा बनाए रखने के लिए लाया गया है।
लोकसभा में भी मिल चुका है जरूरी समर्थन
केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने रविवार को जानकारी दी कि लोकसभा में भी इस प्रस्ताव को पेश करने के लिए आवश्यक समर्थन हासिल हो चुका है। उन्होंने बताया कि 100 से अधिक सांसदों ने हस्ताक्षर कर दिए हैं और हस्ताक्षर प्रक्रिया अब भी जारी है।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि संसद में प्रस्ताव को कब और कैसे पेश किया जाएगा, इसका निर्णय कार्य मंत्रणा समिति (BAC) करेगी।
संवैधानिक प्रक्रिया क्या कहती है?
महाभियोग की प्रक्रिया भारतीय संविधान के अनुच्छेद 124, 217 और 218 के तहत की जाती है। इसमें पहले आरोपों की जांच होती है और फिर संसद के दोनों सदनों से दो-तिहाई बहुमत मिलने पर न्यायाधीश को पद से हटाया जा सकता है।
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जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव ने भारतीय न्यायपालिका में जवाबदेही और पारदर्शिता पर राष्ट्रीय बहस छेड़ दी है। अब सभी की निगाहें संसद की कार्यवाही पर टिकी हैं, जहां यह तय होगा कि क्या यह मामला सिर्फ आरोपों तक सीमित रहेगा या आगे चलकर भारत के न्यायिक इतिहास में एक बड़ा फैसला साबित होगा।









