नेशनल हेराल्ड केस से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में राउज एवेन्यू कोर्ट ने प्रवर्तन निदेशालय (ED) की ओर से दाखिल चार्जशीट पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया है। अदालत के इस फैसले को कांग्रेस नेता राहुल गांधी और सोनिया गांधी के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है। हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि ईडी चाहे तो इस मामले में अपनी जांच आगे जारी रख सकती है।
चार्जशीट में कई नाम शामिल
ईडी ने अपनी चार्जशीट में सोनिया गांधी, राहुल गांधी, सैम पित्रोदा, सुमन दुबे, सुनील भंडारी के अलावा यंग इंडियन और डोटेक्स मर्चेंडाइज प्राइवेट लिमिटेड को आरोपी बनाया था। कांग्रेस का कहना है कि यह कार्रवाई राजनीतिक प्रतिशोध से प्रेरित है, जबकि ईडी का दावा है कि उसके पास गंभीर आर्थिक अनियमितताओं और मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े ठोस सबूत मौजूद हैं।
यंग इंडियन के जरिए संपत्तियों पर कब्जे का आरोप
ईडी के अनुसार, कथित साजिश के तहत एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड (AJL) की लगभग 2,000 करोड़ रुपये की संपत्तियों को बेहद कम कीमत पर अपने नियंत्रण में लिया गया। जांच एजेंसी का आरोप है कि निजी कंपनी यंग इंडियन के जरिए यह अधिग्रहण महज 50 लाख रुपये में किया गया। इस कंपनी में सोनिया गांधी और राहुल गांधी की संयुक्त हिस्सेदारी करीब 76 प्रतिशत बताई गई है।
ईडी ने इस पूरे मामले में अपराध से अर्जित आय (Proceeds of Crime) लगभग 988 करोड़ रुपये आंकी है, जबकि इससे जुड़ी संपत्तियों का बाजार मूल्य करीब 5,000 करोड़ रुपये बताया गया है।
चार्जशीट से पहले संपत्तियों पर कार्रवाई
चार्जशीट दाखिल होने से पहले ही ईडी ने जांच के दौरान बड़ी कार्रवाई की थी। 12 अप्रैल 2025 को कुर्क की गई संपत्तियों को जब्त करने की प्रक्रिया शुरू की गई। इसके तहत दिल्ली के बहादुर शाह जफर मार्ग स्थित हेराल्ड हाउस, मुंबई के बांद्रा (ईस्ट) और लखनऊ के विशेश्वर नाथ रोड पर मौजूद AJL की इमारतों पर नोटिस लगाए गए थे।
इन अचल संपत्तियों की अनुमानित कीमत लगभग 661 करोड़ रुपये बताई गई है। इसके अलावा, नवंबर 2023 में ईडी ने AJL के करीब 90.2 करोड़ रुपये मूल्य के शेयर भी कुर्क किए थे, ताकि कथित अपराध से जुड़ी संपत्तियों को सुरक्षित रखा जा सके।
क्या है नेशनल हेराल्ड मामला?
नेशनल हेराल्ड अखबार की स्थापना वर्ष 1938 में पंडित जवाहरलाल नेहरू ने हजारों स्वतंत्रता सेनानियों के सहयोग से की थी। इसका प्रकाशन एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड करती थी। वर्ष 2008 में अखबार का प्रकाशन बंद हो गया, जिसके बाद इसके अधिग्रहण और संपत्तियों के हस्तांतरण को लेकर विवाद खड़ा हो गया। इसी विवाद ने बाद में कथित घोटाले और मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपों का रूप ले लिया, जिसकी जांच आज भी जारी है।









