संसद के शीतकालीन सत्र से ठीक पहले केंद्र की राजनीति एक बार फिर गरमा गई है। पीएम मोदी ने विपक्ष को रचनात्मक भूमिका निभाने की नसीहत देते हुए कहा कि सदन में “ड्रामा नहीं, डिलीवरी” होनी चाहिए। उन्होंने विपक्ष को सलाह दी कि वे चुनावी हार की निराशा से बाहर निकलकर नीतियों, योजनाओं और ठोस काम पर ध्यान दें, क्योंकि यह सत्र देश की प्रगति के लिहाज़ से बेहद अहम है।
प्रधानमंत्री ने कहा कि संसद जनता की उम्मीदों को पूरा करने का स्थान है, इसे राजनीतिक भावनाएं निकालने का मंच न बनाया जाए। उन्होंने जोर देकर कहा कि बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों ने एक बार फिर लोकतंत्र की मजबूती को साबित किया है, लेकिन विपक्ष इन नतीजों को लेकर हताश नजर आ रहा है।
पीएम मोदी ने आगे कहा कि यह सत्र केवल परंपरा नहीं, बल्कि विकास को गति देने वाला महत्वपूर्ण मौका है। उन्होंने सदन में सकारात्मक बहस, नीति आधारित चर्चा और युवाओं को अधिक अवसर देने की आवश्यकता बताई। प्रधानमंत्री के अनुसार, नई पीढ़ी की सोच और ऊर्जा से संसद और देश दोनों को लाभ मिलेगा।
प्रियंका गांधी का पलटवार,“मुद्दे उठाना ड्रामा नहीं”
प्रधानमंत्री के बयान पर कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी ने कड़ी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि संसद में जनता के मुद्दों पर सवाल उठाना लोकतांत्रिक अधिकार है, जिसे ‘ड्रामा’ कहना गलत है। प्रियंका ने कहा कि बेरोज़गारी, प्रदूषण और महंगाई जैसे गंभीर विषयों पर बहस की जरूरत है, न कि चर्चा को रोका जाए।
उनका कहना था कि असल ‘ड्रामा’ तो तब होता है जब महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा की इजाज़त नहीं दी जाती और विपक्ष की आवाज दबाई जाती है।
अखिलेश यादव का आरोप—“ड्रामा कौन कर रहा है, देश जानता है”
समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने भी प्रधानमंत्री के बयान पर जवाब देते हुए कहा कि वास्तविक ‘ड्रामा’ बीजेपी कर रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि कई स्थानों पर बीएलओ की मौत, मतदाताओं पर दबाव और पुलिस की मिलीभगत गंभीर सवाल खड़े करते हैं।
अखिलेश ने दावा किया कि बीजेपी ने चुनावी रणनीति के लिए एक बड़ी कंपनी को नियुक्त किया है और कई जगहों पर मतदाता सूची में गड़बड़ी की कोशिश की जा रही है। उन्होंने कहा कि शादी के सीजन में लगातार एसआईआर जारी होना भी चुनावी दबाव की रणनीति का हिस्सा है।
लोकसभा स्पीकर की अपील—“सदन को प्रोडक्टिव बनाएं”
शीतकालीन सत्र से पहले लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने उम्मीद जताई कि सभी सांसद लोकतांत्रिक परंपराओं को मजबूत करेंगे और सत्र को सार्थक तथा उत्पादक बनाने में सहयोग करेंगे।
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शीतकालीन सत्र शुरू होने से पहले ही राजनीतिक बयानबाजी तेज हो चुकी है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या सदन में रचनात्मक बहस होगी या फिर राजनीतिक टकराव हावी रहेगा।









