National flag day: आज का दिन भारतीय इतिहास में खास है। क्योंकि, आज है राष्ट्रीय ध्वज दिवस। भारतीय राष्ट्रीय ध्वज, भारत के ब्रिटिश शासन से स्वतंत्र होने का प्रतीक है। जब यह तिरंगा ऊंचाई पर लहराता है तो हर भारतीय के दिल में गर्व और राष्ट्रभक्ति की भावना जाग जाती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह ध्वज स्वतंत्रता से कुछ हफ्ते पहले ही अपनाया गया था?
22 जुलाई 1947 को भारत की संविधान सभा ने स्वतंत्र भारत के राष्ट्रीय ध्वज के रूप में तिरंगे को आधिकारिक रूप से अपनाया। यह निर्णय भारत की संप्रभुता की ओर एक निर्णायक कदम था।
इस ध्वज को मूल रूप से पिंगली वेंकैया ने 1921 में डिज़ाइन किया था, और यह विगत वर्षों में कई बदलावों से गुजरा। प्रारंभिक डिजाइन में लाल और हरे रंग की पट्टियां थीं, जो क्रमशः हिंदू और मुस्लिम समुदायों का प्रतिनिधित्व करती थीं, और बीच में चरखा था। महात्मा गांधी के सुझाव पर, इसमें सफेद पट्टी जोड़ी गई जो शांति और अन्य समुदायों का प्रतीक बनी। 1931 में, केसरिया, सफेद और हरे रंग की पट्टियों वाला ध्वज अपनाया गया, जिसमें चरखा बीच में था।
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इस झंडे को ‘स्वराज ध्वज’ या ‘गांधी ध्वज’ कहा जाता था और यह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कई अधिवेशनों में प्रयोग हुआ। स्वतंत्रता के निकट आते-आते, एक ऐसे झंडे की आवश्यकता महसूस हुई जो सम्पूर्ण भारत का प्रतिनिधित्व करे और किसी भी सांप्रदायिक रंग से परे हो।
इसके लिए डॉ. राजेंद्र प्रसाद की अध्यक्षता में एक अस्थायी समिति बनाई गई, और 22 जुलाई 1947 को पंडित जवाहरलाल नेहरू ने संविधान सभा में प्रस्ताव प्रस्तुत किया।
नया ध्वज तीन रंगों से मिलकर बना था
- गहरा केसरी (ऊपर) – साहस और बलिदान का प्रतीक
- सफेद (मध्य) – शांति, सत्य और पवित्रता
- हरा (नीचे) – उर्वरता और समृद्धि
बीच में अशोक चक्र को स्थान दिया गया, जो सम्राट अशोक के सारनाथ के सिंह स्तंभ से प्रेरित है। यह चक्र निरंतर प्रगति और गति का प्रतीक है।

ध्वज को अपनाना केवल प्रतीकात्मक नहीं था, बल्कि यह राष्ट्र की पहचान और स्वतंत्रता का ऐलान था। ध्वज को अपनाते समय नेहरू ने कहा था- ‘यह झंडा केवल हमारी आज़ादी का नहीं, बल्कि सभी लोगों की आज़ादी का प्रतीक है।’







