President Droupadi Murmu’s birthday: 20 जून, शुक्रवार यानि आज देश की महामहिम राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का जन्मदिन है। आज पूरा देश भारत की 15वीं राष्ट्रपति और देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर आसीन होने वाली पहली आदिवासी महिला और देश की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का जन्मदिन मना रहा है। लेकिन इस ऐतिहासिक और गरिमामयी उपलब्धि के पीछे एक ऐसा जीवन छिपा है, जिसमें शांत संघर्ष, गहरी आत्मशक्ति और बेहद सादा पृष्ठभूमि की झलक मिलती है।
जिनमें से कई बातें आज भी बहुत से लोग नहीं जानते। इस जन्मदिन पर हम राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के जीवन से जुड़े 10 अनसुने तथ्यों के माध्यम से उन्हें सम्मानित कर रहे हैं..

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जन्म का नाम ‘द्रौपदी’ नहीं था
ओडिशा के मयूरभंज ज़िले में संथाल जनजाति परिवार में जन्मी मुर्मू का असली नाम दुर्गी बिरांची टुडू था। परिवार और गांव में उन्हें प्यार से ‘पूटी’ बुलाया जाता था। बाद में उनके एक शिक्षक ने उन्हें ‘द्रौपदी’ नाम दिया, जो महाभारत की नायिका द्रौपदी के नाम पर था।
ग्राम स्तर की राजनीति से नाता
उनके दादा और पिता दोनों मयूरभंज के राजाओं के ग्राम प्रधान थे। यहीं से उन्हें लोगों की सेवा और नेतृत्व की प्रेरणा मिली।
बिजली रहित गांव में शिक्षा का जुनून
वह एक ऐसे गांव में पली-बढ़ीं जहां बिजली तक नहीं थी। किताबों को सही रखने के लिए वे आटे और पानी से खुद गोंद बनाकर फटी हुई किताबें ठीक किया करती थीं।
शिक्षिका के रूप में नि:स्वार्थ सेवा
श्री अरविंद इंटीग्रल एजुकेशन सेंटर में वे हिंदी से लेकर भूगोल तक पढ़ाया करती थीं। लेकिन कभी पूरी तनख्वाह की मांग नहीं की। वह शिक्षा को सेवा मानकर पढ़ाती थीं, चाहे वेतन मिले या न मिले।
100 से अधिक बार रक्तदान
उनके परहित की भावना का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि उन्होंने 100 से ज़्यादा बार रक्तदान किया है।
व्यक्तिगत त्रासदी और आत्मबल
अपने पति और दो बेटों को खोने के बाद भी उन्होंने सात्विक भोजन को अपनाया और आदिवासी व्यंजन जैसे अरीसा पीठा में अपनी जड़ों को बनाए रखा।
राजयोग और ब्रह्मकुमारी
दुखों से उबरने के लिए उन्होंने राजयोग ध्यान में रुचि ली और ब्रह्मकुमारी आध्यात्मिक आंदोलन से जुड़ीं। वे इस अनुभव को अपनी मानसिक और आत्मिक शांति का आधार मानती हैं।

अपनी संस्कृति के साथ कार्यस्थल पर
शपथ ग्रहण समारोह में उन्होंने संथाल समुदाय की पारंपरिक ‘झाल’ साड़ी पहनकर अपनी संस्कृति का सम्मान किया।
1947 के बाद जन्मीं पहली राष्ट्रपति
वे आजादी के बाद जन्म लेने वाली पहली राष्ट्रपति हैं, जो न केवल आदिवासी समाज की बल्कि आज़ाद भारत की आकांक्षाओं और उम्मीदों की प्रतीक हैं।
पहली महिला आदिवासी राज्यपाल
राष्ट्रपति बनने से पहले, वे झारखंड की पहली महिला आदिवासी राज्यपाल भी रह चुकी हैं (2015–2021)। यहाँ भी उन्होंने नम्र और साहसी नेतृत्व की मिसाल पेश की।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का जीवन इस बात का प्रमाण है कि साधारण परिस्थितियों से निकलकर भी कोई व्यक्ति असाधारण ऊंचाइयों तक पहुंच सकता है। अगर उसमें सेवा, संघर्ष और आत्मबल की भावना हो।









