उत्तर प्रदेश में हरदोई जिले के फैजुल्लापुर क्षेत्र में सेवा दे रहे शिवेंद्र सिंह बघेल (वायरल गुरु) का नाम एक चमकते सितारे की तरह है। एक पूर्व पत्रकार से सरकारी शिक्षक बने इस समर्पित गुरु की कहानी न केवल छात्रों के जीवन को रोशन करती है, बल्कि ग्रामीण भारत की शिक्षा प्रणाली में बदलाव की एक मिसाल पेश करती है। उनकी यात्रा – चंदौली से हरदोई तक – बच्चों के आंसुओं, वायरल वीडियोज और नवीन शिक्षण विधियों से भरी हुई है। आज, जब शिक्षा का स्तर गिरता जा रहा है, शिवेंद्र सर जैसे शिक्षक उम्मीद की किरण बने हुए हैं।
शिवेंद्र सिंह बघेल का जन्म उत्तर प्रदेश के एक साधारण परिवार में हुआ था। बचपन से ही जिज्ञासु स्वभाव के कारण उन्होंने पत्रकारिता को अपनाया। वर्षों तक मीडिया में काम करते हुए, उन्होंने ग्रामीण भारत की सच्चाई को करीब से देखा। सरकारी स्कूलों की बदहाली, बच्चों की उदासीनता और अभिभावकों की अनदेखी – ये सबने उनके मन को झकझोर दिया।शिवेंद्र का कहना है कि”पत्रकारिता ने मुझे समाज की समस्याओं से रूबरू कराया, लेकिन समाधान के लिए खुद जमीन पर उतरना पड़ा,” ।

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2018 में, उत्तर प्रदेश बेसिक शिक्षा विभाग में सहायक शिक्षक के रूप में प्रवेश करना उनके जीवन का टर्निंग पॉइंट था। पहली पोस्टिंग चंदौली जिले के चकिया ब्लॉक के रतिगढ़ प्राथमिक विद्यालय में हुई। यहां से शुरू हुई उनकी ‘गुरु यात्रा’, जो आज फैजुल्लापुर तक पहुंच चुकी है।
चंदौली का इलाका पहाड़ी और दुर्गम था। स्कूल तक पहुंचने के लिए वाराणसी से चार घंटे का सफर तय करना पड़ता था। टूटी सड़कें, अनियमित परिवहन और मौसमी बाधाएं – ये चुनौतियां आम थीं। लेकिन शिवेंद्र सर ने कभी हार नहीं मानी। स्कूल पहुंचकर उन्होंने पाया कि उपस्थिति मात्र 20-30 प्रतिशत है। बच्चे दूर गांवों से आते, लेकिन पढ़ाई के बोरिंग तरीके से जल्दी थक जाते। कई तो स्कूल छोड़ देते। सर ने फैसला लिया – पारंपरिक विधियों को छोड़कर, खेल-कूद और डिजिटल टूल्स से शिक्षा को मजेदार बनाना। “बच्चे फूल हैं, उन्हें प्यार से सींचना पड़ता है, डांट से नहीं,” उनका मानना है।
उन्होंने क्रिकेट खेलना शुरू किया। मैदान पर वर्णमाला सिखाते, पहाड़ियों पर दौड़ लगाते। एक वायरल वीडियो में ‘क’ से ‘ज्ञ’ तक की वर्णमाला को कविताओं से जोड़ा: “क से कबूतर उड़ गया फर फर, ख से खरगोश दौड़ा बड़ी जोर।” बच्चे हंसते-खेलते सीखने लगे। सोशल मीडिया पर जागरूकता फैलाते, अभिभावकों को जोड़ते। नतीजा? उपस्थिति दोगुनी हो गई। स्कूल एक उत्सव स्थल बन गया। चार सालों में रतिगढ़ स्कूल मॉडल स्कूल की तरह चमक उठा। लेकिन 2022 में ट्रांसफर ऑर्डर आया – हरदोई के फैजुल्लापुर। यह खबर बच्चों के लिए सदमा थी।
ट्रांसफर के दिन का दृश्य आज भी लोगों को भावुक कर देता है। विदाई समारोह में बच्चे फूट-फूटकर रो पड़े। छोटे-छोटे हाथ सर के पैरों से लिपट गए, “सर, मत जाओ!” की पुकार गूंजी। एक बच्ची ने कहा, “सर, आप हमारे दोस्त हो, स्कूल बिना आपके सूना हो जाएगा।” यह वीडियो चैनलों पर वायरल हो गया। लाखों व्यूज, हजारों शेयर्स। सोशल मीडिया पर लोग कहने लगे, “यह है सच्चा गुरु-शिष्य बंधन।” शिवेंद्र सर ने बच्चों को गले लगाते हुए कहा, “मैं लौट आऊंगा, पढ़ाई जारी रखो। तुम्हारे सपने पूरे होंगे।” इस घटना ने उन्हें ‘वायरल गुरु’ का खिताब दिलाया। गूगल सर्च में उनका नाम आने लगा। पत्रकारिता के अनुभव ने यहां काम किया – उन्होंने खुद वीडियो शेयर किए, जो राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बने।
ट्रांसफर के बाद, 18 जून 2022 को हरदोई पहुंचे। फैजुल्लापुर ग्रामीण इलाका है – कृषि प्रधान, गरीबी से जूझता। प्राथमिक विद्यालय छोटा सा, संसाधनों की कमी। उपस्थिति लाने का चैलेंज। लेकिन सर ने जज्बा नहीं छोड़ा। डिजिटल टूल्स अपनाए, वीडियो बनाए। एक वीडियो देखने को मिला कि विद्यालय में दिनों के नाम लिखने का कंपटीशन किय, जानबूझकर खुद ज्यादा समय लिया, लेकिन बच्चियों ने बिना गलती के लिख दिखाया। यह ‘हार’ ने बच्चों में आत्मविश्वास भरा। “कभी-कभी आपकी हार, बच्चों में जीत का जज्बा भर जाती है,” वे कहते हैं।
फैजुल्लापुर में अभिभावकों से मिलना शुरू किया। गांव-गांव जाकर शिक्षा का महत्व बताया वहां बच्चों को तारीफ की, कहानियां सुनाई जिससे अभिभावक भी जागरूक हुए। “जब मौका मिले, जैसे समझ आए वैसे पढ़ाओ। तारीफ करना न भूलो,” उनका मंत्र है। इन प्रयासों से उपस्थिति बढ़ी, बच्चे आत्मविश्वास से भर गए। एक बच्चे ने कहा, “सर ने हमें उड़ना सिखाया।”
2023-24 में उनकी यात्रा और मजबूत हुई। अन्य शिक्षकों जैसे ने भी उनकी जाकर तारीफ़ की । आज 2025 में, फैजुल्लापुर स्कूल फल-फूल रहा। सर कहते, “शिक्षक का काम किताबें पढ़ाना नहीं, सपने बुनना है।”
शिवेंद्र सर की कहानी शिक्षा प्रणाली की कमियों को उजागर करती है – संसाधन कमी, ट्रांसफर अनिश्चितता। लेकिन उनका समर्पण मिसाल है। वायरल वीडियोज ने लाखों को प्रेरित किया। शिक्षक दिवस पर, हम उन्हें सलाम करते हैं। यदि हर शिक्षक ऐसा हो, भारत शिक्षा महाशक्ति बनेगा। आइए, संकल्प लें – शिक्षा को मजेदार बनाएं।
अब तक किए गए बदलाव
▪️बच्चों की खेलने हेतु बच्चों के झूले का इंतज़ाम
▪️बच्चों केशुद्ध पेयजल हेतु आर ओ का इंतज़ाम
▪️बच्चो के लिए डिजिटल क्लासरूम
▪️बच्चों के लिए नए किचन गार्डन का इंतज़ाम
अब तक प्राप्त पुरस्कार
▪️नाबार्ड द्वारा उत्कृष्ट शिक्षक सम्मान
▪️राष्ट्रीय शैक्षिक महाकुंभ द्वारा राष्ट्रीय धरोहर सम्मान
▪️जी न्यूज द्वारा रियल हिरोज अवॉर्ड
▪️खाना बैंक ट्रस्ट द्वारा उत्कृष्ट शिक्षक सम्मान
▪️डिवाइन कैरियर उन्नाव द्वारा उत्कृष्ट शिक्षक सम्मान
▪️उम्मीद एक किरण द्वारा शिक्षक सम्मान
▪️यूथ वीलर्स फाउंडेशन कानपुर द्वारा शिक्षक सम्मान
▪️रोटरी क्लब शुक्लागंज द्वारा उत्कृष्ट शिक्षक सम्मान









