उत्तर प्रदेश पंचायत चुनाव को लेकर तैयारियां तेज हो गई हैं। राज्य निर्वाचन आयोग ने पंचायत चुनाव के लिए मतदाता पुनरीक्षण सूची जारी कर दी है। इसके साथ ही अंतिम मतदाता सूची के प्रारूप का प्रकाशन भी कर दिया गया है, जिससे चुनावी प्रक्रिया औपचारिक रूप से आगे बढ़ती नजर आ रही है।
निर्वाचन आयोग के मुताबिक 24 दिसंबर से 30 दिसंबर तक मतदाता सूची का निरीक्षण किया जाएगा। इस दौरान मतदाता अपने नाम, पते या अन्य विवरण से जुड़ी दावे और आपत्तियां दर्ज करा सकेंगे। इसके बाद 31 दिसंबर से 6 जनवरी के बीच इन दावों और आपत्तियों का निस्तारण किया जाएगा। सभी प्रक्रियाएं पूरी होने के बाद 6 फरवरी को अंतिम मतदाता सूची जारी होने की संभावना जताई जा रही है।
करीब 40 लाख नए नाम जुड़े
हाल ही में सामने आई जानकारी के अनुसार पंचायत चुनाव के लिए तैयार की जा रही मतदाता सूची में लगभग 40 लाख नए नाम जोड़े गए हैं। इससे यह साफ है कि इस बार मतदाताओं की संख्या में बड़ा इजाफा हुआ है। अंतिम सूची जारी होने के बाद अब केवल पिछड़ा वर्ग आयोग के गठन का इंतजार रहेगा, जो सीटवार आरक्षण तय करता है।
आरक्षण से जुड़ी सूची जारी होने और उस पर आई आपत्तियों के निपटारे के बाद ही पंचायत चुनाव की तारीखों का ऐलान किया जाएगा। ऐसे में फरवरी के बाद चुनावी गतिविधियों में और तेजी आने की उम्मीद है।
पंचायत चुनाव को माना जा रहा ‘सेमीफाइनल’
राजनीतिक दृष्टि से यूपी पंचायत चुनाव को वर्ष 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव का सेमीफाइनल माना जा रहा है। सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के लिए यह चुनाव जनता के भरोसे की अग्निपरीक्षा की तरह होगा। पार्टी की कोशिश रहेगी कि वह ग्रामीण स्तर पर अपनी पकड़ मजबूत साबित करे।
वहीं समाजवादी पार्टी का फोकस ज्यादा से ज्यादा पंचायतों में जीत दर्ज कर अपनी राजनीतिक ताकत दिखाने पर रहेगा, ताकि विधानसभा चुनाव से पहले माहौल अपने पक्ष में बनाया जा सके।
अन्य दल भी मैदान में सक्रिय
बीजेपी और सपा के अलावा राष्ट्रीय लोकदल और कांग्रेस भी पंचायत चुनाव को लेकर अपनी रणनीतियों को अंतिम रूप देने में जुटी हैं। कांग्रेस ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि वह पंचायत चुनाव अकेले लड़ेगी। पार्टी का कहना है कि इस फैसले का असर भविष्य में विधानसभा चुनाव के लिए समाजवादी पार्टी के साथ होने वाले गठबंधन पर नहीं पड़ेगा।
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कुल मिलाकर मतदाता सूची जारी होने के साथ ही यूपी पंचायत चुनाव की सियासी बिसात बिछनी शुरू हो गई है और आने वाले महीनों में ग्रामीण राजनीति पूरी तरह गरमाने के संकेत दे रही है।









