सुप्रीम कोर्ट में देश के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) बी आर गवई पर एक वकील द्वारा जूता फेंकने की कोशिश के बाद विवाद गहराता जा रहा है। इस घटना की निंदा न केवल न्यायिक समुदाय ने की है, बल्कि अब खुद सीजेआई की मां कमलताई गवई और बहन कीर्ति गवई ने भी इसे लोकतंत्र और संविधान पर हमला बताया है।
कमलताई गवई की सख्त प्रतिक्रिया
मुख्य न्यायाधीश की मां कमलताई गवई ने कहा कि संविधान ने सभी को अपने विचार रखने की स्वतंत्रता दी है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि कोई व्यक्ति कानून हाथ में लेकर अराजकता फैलाए। उन्होंने कहा, “डॉ. भीमराव अंबेडकर द्वारा रचित संविधान ‘आप जिएं और दूसरों को भी जीने दें’ के सिद्धांत पर आधारित है। किसी को भी ऐसा गैरकानूनी कृत्य करने का अधिकार नहीं है। जो भी बात रखनी है, उसे शांति और संवैधानिक तरीके से रखा जाना चाहिए।”
कीर्ति गवई: ‘यह विचारधारा का ज़हर है’
सीजेआई की बहन कीर्ति अर्जुन गवई ने भी इस घटना पर गहरी नाराजगी जताई और इसे केवल व्यक्तिगत हमला न मानकर एक “जहरीली विचारधारा” का हिस्सा बताया। उन्होंने कहा, “यह घटना केवल मेरे भाई पर हमला नहीं थी, यह भारत के संविधान, न्याय व्यवस्था और शांतिपूर्ण विमर्श की नींव पर हमला है। जो लोग ऐसे असंवैधानिक कृत्य कर रहे हैं, उन पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।”
उन्होंने आगे कहा कि हमें डॉ. अंबेडकर के विचारों को ठेस पहुंचाने वाले कृत्यों से बचना चाहिए और लोकतंत्र में विश्वास बनाए रखना चाहिए।
क्या हुआ था कोर्ट में?
6 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट में उस समय अजीब स्थिति उत्पन्न हो गई जब एक वकील राकेश किशोर अचानक सीजेआई बी.आर. गवई की बेंच की ओर बढ़ा और जूता फेंकने की कोशिश की। कोर्ट में मौजूद सुरक्षाकर्मियों ने तुरंत उसे पकड़ लिया और कोर्ट से बाहर कर दिया।
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, बाहर जाते समय वह “सनातन धर्म का अपमान नहीं सहेगा हिंदुस्तान” जैसे नारे लगा रहा था। हालांकि, सीजेआई गवई इस पूरे घटनाक्रम के दौरान पूरी तरह शांत रहे और वकीलों से कहा कि इस घटना से विचलित न हों। उन्होंने कहा, “ऐसी चीजों से मुझ पर कोई असर नहीं होता।”
बार काउंसिल ने रद्द किया वकालत का लाइसेंस
इस घटना के तुरंत बाद बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने कड़ी कार्रवाई करते हुए राकेश किशोर का वकालत लाइसेंस रद्द कर दिया है। अब वह किसी भी अदालत, ट्रिब्यूनल या अधिकरण में वकालत नहीं कर सकेंगे।
वकील राकेश किशोर का अजीब दावा
राकेश किशोर ने अपनी हरकत को “ईश्वरीय प्रेरणा” बताया है। उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा, “यह मैंने नहीं किया, परमात्मा ने मुझसे कराया। मुझे नहीं पता कि याचिका किसने दाखिल की थी, पर सुनवाई के दौरान सीजेआई ने ऐसी टिप्पणी की जो मुझे सही नहीं लगी। मुझे दुख हुआ, इसलिए मैंने यह कदम उठाया।”
किशोर के अनुसार, विवाद खुजराहो में भगवान विष्णु की एक खंडित मूर्ति को लेकर दायर पीआईएल से जुड़ा था। उनका आरोप है कि सुनवाई के दौरान सीजेआई ने मूर्ति की मरम्मत की मांग को खारिज करते हुए कथित तौर पर एक आपत्तिजनक टिप्पणी की थी।
न्यायपालिका पर हमला या अभिव्यक्ति की आज़ादी की सीमा?
यह घटना एक बार फिर सवाल खड़े कर रही है कि न्यायपालिका में असहमति व्यक्त करने के सही और लोकतांत्रिक तरीके क्या हैं। जहां एक ओर संवैधानिक मूल्यों की रक्षा की बात हो रही है, वहीं दूसरी ओर कुछ समूह इस कृत्य को “धार्मिक अस्मिता” से जोड़ रहे हैं।
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लेकिन यह स्पष्ट है कि भारत के संविधान में हिंसा या अराजकता के लिए कोई जगह नहीं है – और देश की सर्वोच्च अदालत पर इस तरह का हमला न केवल कानून के खिलाफ है, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा के खिलाफ भी।









