देश को नया उपराष्ट्रपति मिलने वाला है, लेकिन मौजूदा घटनाक्रम ने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है। उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने संसद के मॉनसून सत्र के पहले ही दिन, यानी 21 जुलाई को अपने पद से इस्तीफा देकर सबको चौंका दिया। भले ही उन्होंने सार्वजनिक रूप से स्वास्थ्य कारणों का हवाला दिया हो, लेकिन सूत्रों के मुताबिक इस्तीफे के पीछे कारण कुछ और ही हैं।
हिन्दुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, धनखड़ और केंद्र सरकार के बीच मतभेद हाल ही में तेज हो गए थे। खासकर दिल्ली हाईकोर्ट के जज, जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ लाए गए महाभियोग प्रस्ताव को लेकर विवाद और बढ़ गया। विपक्ष की ओर से जस्टिस वर्मा के खिलाफ प्रस्ताव लाया गया था, जिसे उपराष्ट्रपति धनखड़ ने औपचारिक रूप से स्वीकार कर लिया। वहीं, केंद्र सरकार भी इसी मुद्दे पर एक अलग प्रस्ताव लाने की योजना में थी, लेकिन उसे धनखड़ की ओर से कोई समर्थन नहीं मिला।
सूत्रों के अनुसार, प्रस्ताव स्वीकार करने के बाद धनखड़ के पास केंद्रीय मंत्रियों का फोन आया। बताया जा रहा है कि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा और संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने इस विषय पर उनसे बातचीत की। उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस फैसले से संतुष्ट नहीं हैं।

हालांकि, धनखड़ का जवाब सधा हुआ था। उन्होंने मंत्रियों को बताया कि उन्होंने संविधान और संसदीय नियमों के दायरे में रहकर ही कार्य किया है। उनका यह रुख सरकार के लिए अप्रत्याशित था, क्योंकि आमतौर पर उपराष्ट्रपति, जो राज्यसभा के सभापति भी होते हैं, सरकार के रुख के अनुरूप निर्णय लेते आए हैं।
इस पूरे घटनाक्रम ने उपराष्ट्रपति पद की गरिमा, स्वतंत्रता और उसकी संवैधानिक भूमिका को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है। विपक्ष इसे लोकतंत्र की रक्षा की दिशा में एक साहसिक कदम बता रहा है, तो वहीं सत्ता पक्ष के भीतर असंतोष की लहर देखी जा रही है।
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अब जब देश को नया उपराष्ट्रपति मिलने जा रहा है, यह देखना दिलचस्प होगा कि अगला नाम सत्ता और विपक्ष के बीच संतुलन बना पाएगा या नहीं। लेकिन धनखड़ के इस्तीफे ने यह ज़रूर स्पष्ट कर दिया है कि संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति का विवेक और आत्मनिर्णय कितना अहम होता है।









