दिल्ली MCD के 12 वार्डों में हुए उपचुनाव के नतीजों ने राजधानी की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। इस उपचुनाव में बीजेपी ने शानदार प्रदर्शन करते हुए 7 सीटों पर कब्ज़ा जमाया। आम आदमी पार्टी को 3 वार्डों में जीत मिली, जबकि कांग्रेस और एक निर्दलीय प्रत्याशी ने एक–एक सीट अपने नाम की। इन परिणामों से साफ है कि एमसीडी में आगामी समय में राजनीतिक समीकरण और दिलचस्प हो सकते हैं।
नतीजों के बीच अब दिल्ली में एक और मुद्दा चर्चा में है—एमसीडी पार्षदों की सैलरी, सुविधाएं और उन्हें मिलने वाला फंड। रिपोर्ट्स के अनुसार, दिल्ली नगर निगम का एक पार्षद सालाना करीब 4.9 लाख रुपये का पैकेज प्राप्त करता है। इस हिसाब से पार्षदों की मासिक सैलरी लगभग 41,000 रुपये होती है। इसके अलावा पार्षदों को मीटिंग अलाउंस, यात्रा भत्ता, और कार्यालय संचालन से जुड़ी सुविधाएं भी उपलब्ध कराई जाती हैं।
1 करोड़ रुपये का विकास फंड
दिल्ली के हर पार्षद को अपने वार्ड के विकास कार्यों के लिए 1 करोड़ रुपये तक का फंड मिलता है। इस राशि का उपयोग स्थानीय स्तर पर सड़क निर्माण, नाली-सफाई, पार्कों की देखभाल और अन्य बुनियादी जरूरतों पर किया जाता है। हालांकि अक्सर यह सवाल उठता है कि कई वार्डों में फंड समय पर खर्च क्यों नहीं हो पाता। दरअसल, यह फंड तब जारी होता है जब पार्षद किसी प्रोजेक्ट की औपचारिक शुरुआत करते हैं, जिसकी प्रक्रिया कई बार धीमी पड़ जाती है।
पार्षद बनने के लिए क्या हैं नियम?
एमसीडी पार्षद बनने के लिए कुछ नियम निर्धारित हैं—
- उम्मीदवार का नाम संबंधित वार्ड की मतदाता सूची में होना चाहिए।
- न्यूनतम आयु 21 वर्ष तय की गई है।
- कम से कम 10वीं पास होना अनिवार्य है।
- साथ ही वह दिल्ली का वैध मतदाता होना चाहिए।
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पार्षद का पद केवल चुनाव लड़ने का अवसर नहीं, बल्कि पूरे वार्ड की जिम्मेदारी का प्रतीक है। सफाई व्यवस्था से लेकर सड़क और नाली जैसे बुनियादी ढांचे तक तथा सार्वजनिक सुविधाओं की देखरेख तक, हर मुद्दे पर पार्षद की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है।
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उपचुनाव के नतीजों और पार्षदों की जिम्मेदारियों पर एक साथ चल रही चर्चाएं इस बात की ओर इशारा करती हैं कि जनता अब केवल नेताओं से जीत ही नहीं, बल्कि उनके काम की पारदर्शिता और प्रभावशीलता भी देखना चाहती है।








