भगवान शिव की नगरी काशी में स्थित माता अन्नपूर्णा देवी मंदिर का द्वार साल भर में केवल चार से पांच दिनों के लिए ही खुलता है, और इन दिनों में लाखों श्रद्धालु यहां दर्शन करने और ‘खजाने का सिक्का’ प्राप्त करने के लिए उमड़ पड़ते हैं। यह अनोखी परंपरा कार्तिक मास के दौरान होती है, जब काशी में देव दीपावली का उत्सव मनाया जाता है।
कौन हैं माता अन्नपूर्णा?
हिंदू मान्यताओं के अनुसार, माता अन्नपूर्णा देवी को अन्न और समृद्धि की देवी माना जाता है। कथा है कि एक बार भगवान शिव ने कहा कि संसार में सब कुछ माया है, भोजन भी। तब माता पार्वती ने क्रोधित होकर अन्न को संसार से हटा लिया। जब सब जगह अकाल पड़ गया, तब भगवान शिव ने उनसे क्षमा मांगी।

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भगवान शिव ने लोगों का पेट भरने के लिए मां अन्नपूर्णा से भिक्षा मांगी थी। मां ने भिक्षा के साथ भगवान शिव को यह वचन दिया कि काशी में कभी कोई भूखा नहीं सोएगा। काशी में आने वाले हर किसी को अन्न मां के ही आशीर्वाद से प्राप्त होता है।
मंदिर के खुलने की विशेषता
काशी विश्वनाथ मंदिर के पास स्थित यह प्राचीन अन्नपूर्णा मंदिर आम दिनों में बंद रहता है। साल में केवल कुछ दिनों के लिए, विशेष रूप से कार्तिक मास की नवमी से पूर्णिमा तक, भक्तों के लिए इसके पट खोले जाते हैं। इन दिनों मंदिर में सोने की अन्नपूर्णा माता की प्रतिमा के दर्शन होते हैं।

‘खजाने का सिक्का’ पाने की परंपरा
मंदिर में दर्शन के बाद भक्तों को एक विशेष चांदी का सिक्का दिया जाता है, जिसे अन्नपूर्णा का खजाना कहा जाता है।
विश्वास है कि यह सिक्का घर में समृद्धि, सुख-शांति और अन्न की कभी कमी नहीं होने का प्रतीक है। भक्त इस सिक्के को अपनी तिजोरी या रसोई में रखते हैं और इसे माँ का आशीर्वाद मानते हैं।
लाखों श्रद्धालु लगाते हैं दर्शन की कतार
मंदिर खुलने के इन चार-पांच दिनों में देशभर से लाखों श्रद्धालु वाराणसी पहुंचते हैं। मंदिर परिसर और आस-पास की गलियों में भक्तों की लंबी कतारें लग जाती हैं। प्रशासन की ओर से विशेष सुरक्षा और यातायात व्यवस्थाएं की जाती हैं।
देव दीपावली से जुड़ा गहरा संबंध
अन्नपूर्णा मंदिर के पट खुलने का समय देव दीपावली से जुड़ा होता है। जब काशी में गंगा के घाटों पर दीपों का सागर सजता है। ऐसा माना जाता है कि इन दिनों देवता स्वयं पृथ्वी पर उतरकर गंगा स्नान करते हैं।
आस्था और विश्वास का केंद्र
माता अन्नपूर्णा का यह मंदिर न केवल बनारस की धार्मिक पहचान है, बल्कि यह दान, भोजन और करुणा की परंपरा का प्रतीक भी है। भक्त मानते हैं कि यहां माता के दर्शन मात्र से जीवन में कभी अन्न की कमी नहीं होती और हर घर में समृद्धि का वास होता है।









