बॉलीवुड की मशहूर अभिनेत्री दीपिका पादुकोण हाल ही में फिल्म ‘स्पिरिट’ और ‘कल्कि 2898 एडी’ के सीक्वल से बाहर होने को लेकर चर्चा में थीं। मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया था कि उन्होंने 8 घंटे की शिफ्ट की मांग की थी, जिसकी वजह से उन्हें इन प्रोजेक्ट्स से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। अब दीपिका ने इस मुद्दे पर अपनी प्रतिक्रिया दी है और वर्किंग ऑवर्स को लेकर फिल्म इंडस्ट्री में मौजूद दोहरे मापदंडों की ओर इशारा किया है।
मैंने हमेशा अपनी लड़ाइयाँ गरिमा के साथ लड़ी हैं
वर्ल्ड मेंटल हेल्थ डे के अवसर पर दीपिका पादुकोण मध्य प्रदेश के भोपाल पहुंचीं, जहां उन्होंने अपने फाउंडेशन ‘लिव लव लाफ’ की दसवीं वर्षगांठ पर एक विशेष कार्यक्रम में हिस्सा लिया। इसी दौरान जब उनसे पूछा गया कि क्या उन्हें कभी अपनी मांगों के लिए कीमत चुकानी पड़ी है, तो उन्होंने शांत और परिपक्व जवाब दिया।
दीपिका ने कहा, “मैंने अपने करियर में कई स्तरों पर यह किया है। चाहे वो मेहनताना हो या काम के घंटे – हर चीज़ से मुझे निपटना पड़ा है। मैं हमेशा अपनी लड़ाइयाँ चुपचाप और गरिमा के साथ लड़ती हूं। कई बार ये चीज़ें सार्वजनिक हो जाती हैं, जो कि मेरा तरीका नहीं है। लेकिन हां, मैं हमेशा अपनी बात मजबूती से रखती हूं, बिना शोर-शराबे के।”
मेल एक्टर्स सालों से 8 घंटे की शिफ्ट कर रहे हैं
सीएनबीसी-टीवी18 को दिए गए इंटरव्यू में दीपिका ने खुलकर कहा कि 8 घंटे की शिफ्ट की मांग करना कोई नई या असामान्य बात नहीं है। उन्होंने फिल्म इंडस्ट्री में महिलाओं और पुरुषों के बीच वर्क कल्चर को लेकर हो रहे भेदभाव पर सवाल उठाए।
उन्होंने कहा, “अगर एक महिला होने के नाते 8 घंटे की शिफ्ट की मांग करना दबाव डालने जैसा लगता है, तो मुझे यह मंजूर है। लेकिन यह किसी से छुपा नहीं है कि कई पुरुष सुपरस्टार सालों से केवल 8 घंटे की शिफ्ट में काम कर रहे हैं। यह कभी सुर्खियों में नहीं आया, जबकि जब एक महिला ऐसा करती है, तो वो खबर बन जाती है।”

दीपिका ने बिना किसी का नाम लिए यह भी कहा कि इंडस्ट्री में कई ऐसे अभिनेता हैं जो सोमवार से शुक्रवार तक ही काम करते हैं और वीकेंड में छुट्टी लेते हैं। “मैं नाम नहीं लेना चाहती, लेकिन यह बहुत आम बात है। पब्लिकली यह सभी को पता है,” उन्होंने कहा।
बदलते वक्त की मांग – स्वस्थ कार्यसंस्कृति
दीपिका पादुकोण का यह बयान न केवल उनके पेशेवर दृष्टिकोण को दर्शाता है, बल्कि यह भी बताता है कि बॉलीवुड में एक स्वस्थ और समान कार्यसंस्कृति की कितनी आवश्यकता है। समय की मांग है कि महिलाओं की आवाज़ को गंभीरता से सुना जाए और काम के संतुलन की बात को अधिकार की तरह स्वीकारा जाए, न कि “डिमांड” या “जिद” के रूप में।
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दीपिका पादुकोण का यह स्पष्ट और गरिमापूर्ण रवैया एक बार फिर यह साबित करता है कि वे सिर्फ एक सफल अभिनेत्री ही नहीं, बल्कि एक मजबूत सोच वाली महिला भी हैं, जो इंडस्ट्री में बदलाव की जरूरत को समझती हैं और बिना शोर मचाए अपनी राह खुद बनाना जानती हैं।









