केंद्र सरकार द्वारा ऑनलाइन गेमिंग बिल 2025 को केंद्रीय मंत्रिमंडल से मंजूरी मिलने के बाद बुधवार को लोकसभा में इसे पेश कर दिया गया। यह विधेयक एक ओर जहां ईस्पोर्ट्स और सोशल गेम्स को बढ़ावा देने का दावा करता है, वहीं दूसरी ओर यह ऑनलाइन मनी गेमिंग पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की बात करता है, जिससे देशभर में कानूनी और संवैधानिक बहस छिड़ गई है।
क्या है ऑनलाइन मनी गेम?
विधेयक के अनुसार, ऑनलाइन मनी गेम वह खेल है जिसे खेलने के लिए कोई शुल्क, पैसा या अन्य दांव (स्टेक) लगाया जाता है और बदले में जीतने पर पैसे या अन्य स्टेक मिलने की उम्मीद की जाती है, चाहे वह खेल कौशल पर आधारित हो या संयोग पर।

संविधानिक और कानूनी आपत्तियाँ
विधेयक पर शुरू से ही कड़ी आपत्तियाँ उठ रही हैं। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह विधेयक न केवल संविधान के अनुच्छेद 19(1)(g) के तहत मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है, बल्कि यह संसद की विधायी सीमाओं से भी बाहर है।
- ‘सट्टा और जुआ’, साथ ही ‘मनोरंजन और अमोद-प्रमोद’, संविधान की सातवीं अनुसूची की राज्य सूची में आते हैं। यानी इन विषयों पर कानून बनाने का अधिकार केवल राज्यों को है। केंद्र सरकार केवल अनुच्छेद 252 के तहत तभी कानून बना सकती है जब दो या अधिक राज्य विधानसभा प्रस्ताव पारित कर इसकी अनुमति दें, जो कि इस मामले में नहीं हुआ है।
- विधेयक में ‘ऑनलाइन मनी गेम’ की जो परिभाषा दी गई है, वह मनमानी, अस्पष्ट और असंवैधानिक मानी जा रही है क्योंकि यह कौशल आधारित खेल और संयोग आधारित खेल के बीच कोई अंतर नहीं करती। कई उच्च न्यायालयों ने यह स्पष्ट किया है कि कौशल आधारित ऑनलाइन गेमिंग पर पूर्ण प्रतिबंध अवैध और असंवैधानिक है।
सुप्रीम कोर्ट में लंबित है मामला
उल्लेखनीय है कि ऑनलाइन गेमिंग से जुड़े सभी प्रमुख संवैधानिक और कानूनी प्रश्न वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट में ‘गेम्सक्राफ्ट मामले’ में लंबित हैं। इस मामले में यह तय होना बाकी है कि:
- क्या ऑनलाइन गेमिंग राज्य का विषय है या केंद्र का?
- क्या पैसे के लिए खेले जा रहे कौशल आधारित ऑनलाइन गेम्स को सट्टा और जुआ माना जा सकता है?
सुप्रीम कोर्ट में इन मुद्दों पर विस्तृत बहस पूरी हो चुकी है और फैसला सुरक्षित रखा गया है।
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ऐसे में केंद्र सरकार द्वारा इस विधेयक को संसद में लाना, सुप्रीम कोर्ट की अवमानना जैसा प्रतीत होता है और कानून विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार को तब तक इस विधेयक को आगे नहीं बढ़ाना चाहिए जब तक सुप्रीम कोर्ट का अंतिम निर्णय नहीं आ जाता। अन्यथा यह विधेयक न्यायिक समीक्षा में टिक नहीं पाएगा।









