Delhi Cloud Seeding: विशेषज्ञों ने दिल्ली सरकार द्वारा किए गए क्लाउड सीडिंग (कृत्रिम वर्षा) परीक्षणों को राजधानी के जहरीले प्रदूषण से निपटने के लिए ‘बेहद महंगा, अस्थायी और अस्थिर उपाय’ बताया है। उनका कहना है कि भले ही कृत्रिम बारिश अस्थायी रूप से प्रदूषकों को नीचे बिठा दे, लेकिन एक-दो दिनों में प्रदूषण फिर से बढ़ जाएगा।
दिल्ली सरकार के पर्यावरण विभाग और आईआईटी कानपुर के बीच हुए समझौते (MoU) के अनुसार, क्लाउड सीडिंग पर कुल बजट 3.2 करोड़ रुपये है, जिसमें 5 परीक्षण शामिल हैं, यानी प्रत्येक परीक्षण पर लगभग 64 लाख रुपये का खर्च। अब तक उत्तर दिल्ली में तीन परीक्षण किए जा चुके हैं, लेकिन किसी में भी महत्वपूर्ण बारिश नहीं हुई। दिल्ली का वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) पिछले कुछ दिनों से ‘बहुत खराब’ से ‘खराब’ श्रेणी के बीच बना हुआ है।
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विशेषज्ञों की राय
अनुमिता रॉयचौधरी, कार्यकारी निदेशक (अनुसंधान और वकालत), सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) ने कहा, ‘क्लाउड सीडिंग के बाद शहर में अभी तक बारिश दर्ज नहीं हुई है। भले ही बारिश अस्थायी रूप से प्रदूषकों को धो दे, लेकिन प्रदूषण जल्द ही वापस लौट आएगा। इसका असर कुछ घंटों से लेकर दो दिनों तक ही रहता है।’
ऐसे निवेशों को जमीन पर मौजूद प्रदूषण के स्रोतों से वास्तविक उत्सर्जन में कमी लाने की दिशा में करना चाहिए, ताकि जनस्वास्थ्य की दीर्घकालिक सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।”
शहज़ाद गनी, सहायक प्रोफेसर, सेंटर फॉर एटमॉस्फेरिक साइंसेज, IIT दिल्ली, ने कहा, ‘सर्दियों में दिल्ली का मौसम आमतौर पर बहुत शुष्क रहता है और हवा में नमी बहुत कम होती है। आमतौर पर इस मौसम में बारिश तभी होती है जब कोई पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbance) मैदानों को प्रभावित करता है।
अगर पश्चिमी विक्षोभ की वजह से बारिश हो रही है, तो क्लाउड सीडिंग की कोई जरूरत नहीं है। और अगर इसी दौरान अचानक बहुत तेज बारिश हो जाए जिससे जान-माल का नुकसान हो, भले ही वह क्लाउड सीडिंग से संबंधित न हो, तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?’
उन्होंने आगे कहा, ‘हम क्यों बार-बार ऐसे तथाकथित ‘सिल्वर बुलेट’ समाधान अपनाते हैं, जैसे स्मॉग टावर, स्मॉग गन और क्लाउड सीडिंग? हमें व्यवस्थित रूप से अलग-अलग स्रोतों से उत्सर्जन कम करने की दिशा में काम करना चाहिए।’
सुनील दहिया, थिंक टैंक EnviroCatalysts के संस्थापक और प्रमुख विश्लेषक, ने कहा, ‘वायु गुणवत्ता में सुधार के लिए परिवहन, बिजली उत्पादन और निर्माण जैसे क्षेत्रों के विशेष उत्सर्जनों पर काम करना जरूरी है। जब तक ऐसा नहीं होगा, कोई वास्तविक प्रभाव नहीं दिखेगा।
केवल ‘कॉस्मेटिक उपाय’ जैसे कृत्रिम बारिश या स्मॉग गन, थोड़े समय के लिए दृश्यता सुधार सकते हैं, लेकिन ये स्थायी समाधान नहीं हैं। असली फोकस राज्यों और एजेंसियों के बीच समन्वित कार्रवाई पर होना चाहिए, जो एक ‘एयरशेड-आधारित दृष्टिकोण’ के तहत प्रदूषण के मूल स्रोतों को लक्षित करे।
पर्यावरण कार्यकर्ता भावना कंधारी ने कहा, ‘क्लाउड सीडिंग केवल तब असरदार हो सकती है जब वातावरण में नमी की कमी हो और बारिश की संभावनाएं सीमित हों। इस बार आसमान में पहले से ही पर्याप्त नमी थी और मौसम विभाग ने पश्चिमी विक्षोभ से प्राकृतिक बारिश की संभावना जताई थी।
ऐसे हालात में क्लाउड सीडिंग का वैज्ञानिक मूल्य बहुत कम रह जाता है। यह बस एक महंगा प्रयोग बन जाता है, जो उसी चीज़ का पीछा कर रहा है जो प्रकृति पहले से करने वाली थी।
स्वच्छ हवा कृत्रिम बारिश से नहीं, बल्कि निरंतर उत्सर्जन में कमी, धूल नियंत्रण और जिम्मेदार नीति-निर्माण से ही आएगी’









