मध्य प्रदेश के ग्वालियर में एक अनोखी लेकिन चिंताजनक घटना सामने आई है, जहां जिला कलेक्टर द्वारा बुलाई गई नगर निगम की अहम बैठक में कुछ महिला पार्षदों की जगह उनके पति उपस्थित हो गए। यह बैठक शहर के बाल भवन में आयोजित की गई थी, जिसमें सफाई, सड़कों की हालत और शहरी विकास जैसे मुद्दों पर चर्चा की जानी थी।
लेकिन बैठक की शुरुआत के कुछ ही समय बाद कलेक्टर रुचिका चौहान ने जब देखा कि कुछ महिला पार्षदों की जगह उनके पति कुर्सियों पर बैठे हैं, तो उन्होंने तुरंत इस पर आपत्ति जताई और नाराजगी जाहिर की।
“महिलाएं सक्षम हैं, उन्हें खुद निर्णय लेने दें” — कलेक्टर रुचिका
कलेक्टर ने पार्षद पतियों को स्पष्ट शब्दों में फटकार लगाते हुए कहा, “महिलाएं अब सशक्त हो चुकी हैं। उन्हें खुद अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करने देना चाहिए। इस तरह पति उनकी जगह बैठकर फैसले नहीं ले सकते।”
उन्होंने पार्षद पतियों से कहा कि वे तुरंत बैठक कक्ष की सीटें छोड़कर दर्शक दीर्घा में बैठ जाएं। प्रशासन की इस सख्ती को वहां मौजूद लोगों ने सराहा भी।

महिला प्रतिनिधित्व का सम्मान जरूरी
बैठक के बाद कलेक्टर रुचिका चौहान ने मीडिया से बातचीत में कहा कि, “ग्वालियर नगर निगम प्रदेश के प्रमुख नगर निगमों में शामिल है। जब प्रतिनिधित्व महिलाओं को दिया गया है, तो यह आवश्यक है कि वे खुद अपने क्षेत्र की समस्याएं समझें और उन पर बात करें। यह न केवल उनके आत्मविश्वास को बढ़ाएगा, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था को भी मजबूती देगा।”
उन्होंने आगे कहा कि महिलाओं को आरक्षण इसलिए दिया गया है ताकि वे राजनीति और सामाजिक विकास की मुख्यधारा में सक्रिय रूप से भागीदारी कर सकें। ऐसे में अगर उनके स्थान पर पति ही सभी निर्णय लेंगे, तो यह व्यवस्था के उद्देश्य को ही विफल करेगा।
पुरानी परंपराओं को तोड़ने की जरूरत
यह घटना देशभर में पंचायत और स्थानीय निकायों में एक आम समस्या को उजागर करती है — जब महिला प्रतिनिधियों के नाम पर चुनाव तो होता है, लेकिन उनके स्थान पर निर्णय उनके पति या परिवार के सदस्य लेते हैं। कलेक्टर की इस पहल को एक सकारात्मक कदम के रूप में देखा जा रहा है, जो न केवल महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा देता है, बल्कि राजनीतिक व्यवस्था को भी अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाता है।
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ग्वालियर में जो हुआ, वह महिला सशक्तिकरण के लिए एक अहम संदेश है। अब समय आ गया है कि महिलाओं को केवल नाम का प्रतिनिधि न बनाकर, उन्हें वास्तविक निर्णय लेने की ताकत और मंच दिया जाए।








