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Kazan 2024: क्या दुनिया की तीन महाशक्तियां वास्तव में मिलायेंगी हाथ ?

ब्रिक्स का मंच सजा है कजान में और पहुंची हुईं हैं तीन विराट शख्सियतें वहां पर.. जिन्हें दूर से कोई घूर रहा है..

Parijat Tripathi by Parijat Tripathi
30 October 2024
in दुनिया, भारत
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अमेरिका को डर..और मोदी निडर

अमेरिका को डर..और मोदी निडर

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सवाल ये है कि क्या BRICS में पुतिन निभाएंगे जिम्मेदारी भारत-चीन के रिश्ते सुधारने की ? अगर हाँ तो इसका ग्लोबल असर क्या हो सकता है? -सवाल तो ये भी है.

दुनिया की तेजी से विकसित होती अर्थव्यवस्थाओं का समूह है BRICS. इसकी 16वीं समिट का आतिथ्य कर रहा रूस का कजान शहर. इसमें रूस और भारत के अतिरिक्त चीन, ब्राजील, साउथ अफ्रीका समेत 28 देशों के राष्ट्र प्रमुख भाग ले रहे हैं.

सबसे अहम बात ये है कि इस साल समिट की अध्यक्षता कर रहे हैं रूस के राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन. और यहीं आज भारत के प्रधानमंत्री मोदी का भाषण हुआ है.

महत्वपूर्ण ये जानना भी है कि ब्रिक्स ने यूरोपियन यूनियन (EU) को पछाड़ दिया है और अब वह दुनिया का तीसरा सबसे शक्तिशाली आर्थिक संगठन बन चुका है. इस तथ्य से ही ब्रिक्स का महत्व समझा जा सकता है कि आज की तारीख में ग्लोबल GDP में जहां EU के देशों की कुल हिस्सेदारी 14% है, वहीं BRICS देशों का हिस्सा 27% है.

हालांकि इसका हेडक्वार्टर चीन के शंघाई में है किन्तु BRICS देशों का ये अपना एक अलग बैंक भी है, जिसे न्यू डेवलपमेंट बैंक के नाम से दुनिया जानती है. इसका दायित्व है कि यह सदस्य देशों को सरकारी या प्राइवेट प्रोजेक्ट्स के लिए कर्जा उपलब्ध कराये.

सही दिशा में है ‘राइजिंग इकोनॉमी’

BRICS का कंसेप्ट ‘राइजिंग इकोनॉमी’ को दृष्टि में रख कर तैयार किया गया था जिसे सार्थक करते हुए इस वैश्विक समूह में पिछले साल तक 5 देश ब्राजील, रूस, चीन, भारत और दक्षिण अफ्रीका शामिल थे. पर अब 40 देशों ने संगठन से जुड़ने की इच्छा जताई है, 34 देशों ने पिछले वर्ष शामिल होना चाहा था और इस वर्ष UAE, ईरान, इजिप्ट और इथोपिया इसके औपचारिक सदस्य बन जाएंगे.

अब सवाल तो ये भी पैदा होता है कि अमेरिका समेत पश्चिमी देशों की नजर इस समूह पर क्यों है और कई देश इसकी मेंबरशिप क्यों चाहते हैं?

क्या आपको आश्चर्य नहीं होता ये जानकार कि जहां एक तरफ दुनिया झेल रही है मंदी की मार तो दूसरी तरफ BRICS देश इससे बेअसर रहे और विकास के रस्ते पर तेजी से आगे बढ़े.

कुछ बात है तो ऐसी

वर्ष 2008-2009 का दौर जहां पश्चिमी देशों के लिए आर्थिक संकट का संदेश लाया था, उसी समय BRICS देशों की अर्थव्यवस्था तेजी से आगे बढ़ रही थी. ध्यान देने वाली बात तो ये है कि उस आर्थिक संकट से पहले पश्चिमी देश दुनिया की 60% से 80% अर्थव्यवस्था को नियंत्रित करते थे, लेकिन मंदी के दौर ने दुनिया को बताया कि BRICS देशों की इकोनॉमिक ग्रोथ में तेजी से आगे बढ़ने और पश्चिमी देशों को टक्कर देने की क्षमता है.

BRICS बन गया है बड़ी चुनौती

ताज़ा खबर ये है कि अब पश्चिमी देशों के लिए BRICS बन गया है बड़ी चुनौती. हाल ही में पुतिन ने SWIFT पेमेंट सिस्टम की तरह BRICS के एक अलग पेमेंट सिस्टम की तयारी की जानकारी दी थी. तो दूसरी तरफ, पिछले ही साल ब्राजील के राष्ट्रपति लूला डा सिल्वा ने एक समिट में कहा था कि BRICS संगठन के देशों को व्यापार के लिए एक नई करेंसी बनानी चाहिए. डॉलर में ट्रेड करने का वक्त अब चला गया.

फ़िलहाल इस दिशा में सिर्फ बात ही हुई है और लगता है कि ये काफी आगे की बात है फिर भी जब भी ऐसा होगा पश्चिमी देशों के और खासकर अमेरिका के हित खासे चोटिल हो सकते हैं.

परेशानी पश्चिमी देशों की

परेशानी पश्चिमी देशों की ये भी है कि ये सन्देश दूर तक क्यों जा रहा है? क्योंकि ब्रिक्स संगठन के कुछ देश इस दिशा में गंभीर हो गए हैं और उन्होंने अपनी नेशनल करेंसी में ट्रेड भी शुरू कर दिया है. इन देशों में चीन और रूस शामिल हैं. यूक्रेन जंग के बाद रूस ने नेशनल करेंसी को उपयोग में लाने की आवश्यकता पर बल दिया है.

डर है दरोगा को

यही तो है अमेरिका का डर..क्या अपने रंग में रंग देंगे मोदी सबको ? अगर तीनों ने वास्तव में हाथ मिला लिया तो अमेरिका का क्या होगा? कहीं दुनिया का दरोगा बेरोजगार न हो जाये..

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