देश के आदिवासी और ग्रामीण इलाकों में लागू पेसा कानून अब केवल एक कानूनी प्रावधान नहीं, बल्कि लोगों के लिए सुरक्षा, स्वावलंबन और विकास का मजबूत जरिया बनता जा रहा है। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और हिमाचल प्रदेश से सामने आई हाल की घटनाएं बताती हैं कि जब ग्राम सभाओं को अधिकार मिलते हैं, तो वे जमीन पर बड़ा बदलाव ला सकती हैं।
मध्य प्रदेश: पेसा से 40 मजदूरों की सुरक्षित वापसी
मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले की पिंडरई कला और चिकटबर्री ग्राम पंचायतों के करीब 40 मजदूर महाराष्ट्र में काम के दौरान शोषण का शिकार हो रहे थे। जैसे ही इसकी जानकारी गांव तक पहुंची, ग्राम सभा ने पेसा कानून के तहत अपने अधिकारों का इस्तेमाल किया।
ग्राम सभा ने न सिर्फ शिकायत दर्ज कराई, बल्कि प्रशासनिक अधिकारियों से समन्वय कर मजदूरों की सुरक्षित घर वापसी सुनिश्चित की। यह मामला दिखाता है कि पेसा कानून के जरिए ग्राम सभा किस तरह प्रवासी मजदूरों के अधिकारों की रक्षा कर सकती है।
छत्तीसगढ़: खमढोड़गी गांव ने संभाली अपने विकास की बागडोर
छत्तीसगढ़ के उत्तर बस्तर कांकेर जिले के कोकपुर ग्राम पंचायत के खमढोड़गी गांव में पेसा लागू होने के बाद हालात तेजी से बदले हैं। यहां की ग्राम सभा ने जंगल, जमीन और प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन की जिम्मेदारी खुद संभाल ली है।
गांव में अवैध गतिविधियों पर रोक लगाई गई है और महुआ, तेंदू, चिरौंजी व हर्रा जैसे वनोपजों के संग्रहण को व्यवस्थित किया गया है। इसके साथ ही ग्रामीणों ने स्वयं सहायता समूहों के जरिए मछली पालन, बांस राफ्टिंग और अन्य आजीविका के साधन विकसित किए हैं।
बांस राफ्टिंग जैसी पहल ने पर्यावरण के अनुकूल पर्यटन को बढ़ावा दिया है, जिससे रोजगार के नए अवसर भी पैदा हो रहे हैं।
हिमाचल प्रदेश: काज़ा में पेसा से व्यवस्थित हुआ स्थानीय बाज़ार
हिमाचल प्रदेश के लाहौल और स्पीति जिले की काज़ा ग्राम पंचायत में भी पेसा कानून का सकारात्मक असर देखने को मिला है। यहां ग्राम सभा ने स्थानीय बाज़ार को सुव्यवस्थित करने के लिए एक बाज़ार नियमन समिति का गठन किया।
समिति ने दुकानों और कारीगरों का पंजीकरण कराया, तय रेट लिस्ट लगवाई, कचरा प्रबंधन की व्यवस्था की और यातायात को नियंत्रित किया। इससे न सिर्फ पर्यटकों को सुविधा मिली, बल्कि स्थानीय व्यापारियों और कारीगरों को भी एक बेहतर व्यवस्था का लाभ मिला।
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पेसा: अधिकार से आत्मनिर्भरता की ओर
इन उदाहरणों से साफ है कि पेसा कानून ग्राम सभाओं को केवल अधिकार नहीं देता, बल्कि उन्हें जिम्मेदारी और आत्मनिर्भरता की दिशा में भी आगे बढ़ाता है। प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण हो, आजीविका के नए साधन हों या बाजार व्यवस्था—जब फैसले गांव के स्तर पर होते हैं, तो उनका असर भी दूरगामी होता है।








