बिहार विधानसभा चुनाव के पहले चरण में 18 जिलों के 121 सीटों पर 6 नवंबर को मतदान हुआ। चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक बिहार ने सारा रिकॉर्ड तोड़ते हुए 64.66% मतदान किया। बंपर वोटिंग के बाद यह चर्चा शुरू हो गई कि यह मतदान किसके पक्ष में है और इसके पीछे का क्या कारण है?
पहला कारण – सभी पार्टियों के कोर वोटर का गोलबंद होना
बीजेपी के वोटर का गोलबंद होना
बिहार विधानसभा चुनाव के शुरुआत से ही यह चर्चा आम हो गई कि इसबार बिहार में बीजेपी अपना मुख्यमंत्री बना सकती है। इस कारण बीजेपी के कोर वोटर और कार्यकर्ताओं में एक नई ऊर्जा का संचार हुआ और बीजेपी के कोर वोटर गोलबंद हुआ। बिहार में वोटर के एक तबके का मानना रहा है कि बीजेपी का सीएम होने से बिहार का विकास अधिक होगा।
साथ ही एक कारण यह भी है कि बिहार में बीजेपी हीं वह पार्टी है जिसके कार्यकर्त्ता अपने वोटर को बूथ तक लाने में सक्षम है।
राजद के MY वोटर का गोलबंद होना
महागठबंधन ने तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित किया। इसके बाद उसका कोर वोटर यादव और मुस्लिम उसके पक्ष में गोलबंद हुआ। 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में महज कुछ वोटों और सीटों से तेजस्वी यादव मुख्यमंत्री बनने से चुक गए थें। सीमांचल के क्षेत्र में पिछली बार ओवैसी की पार्टी ने कुछ खेल बिगाड़ा था लेकिन इस बार सारा मुस्लिम मतदाता तेजस्वी यादव और महागठबंधन के पक्ष में गोलबंद है।
दूसरा कारण – महिला वोटर का निकलना
नीतीश सरकार ने बिहार विधानसभा चुनाव की घोषणा होने से महिला मतदाताओं के लिए सरकार का खजाना खोला दिया। आंगनबाड़ी सेविका का मानदेय सात हजार से बढ़ा कर 9 हजार, आशा वर्कर का मानदेय 1100 से बढ़ा कर 3000, जीविका दीदी को महिला रोजगार योजना के तहत दस हजार रूपये दिए और वृद्धा पेंशन 400 से बढ़ाकर 1100 रूपये कर दिए। इन कारणों से महिला वोटर भी घर से बाहर निकली और मतदान की।
तीसरा कारण – वोट चोरी के मुद्दे से लोगों में जागरूकता आना और अपने वोटों के प्रति सजग होना
कोई अभियान चलता है तो उसका लोगों पर असर पड़ता है। राहुल गांधी ने बिहार में वोट अधिकार यात्रा निकाली जिसमें लोगों की भीड़ उमरी। इसके कारण लोग अपने वोट के प्रति सजग हुए और एक जागरूकता भी आई।
अब सवाल उठता है कि यह वोट किसके पक्ष में पड़ा
आमतौर पर यह मानना है कि जब भी मतदान पिछली बार से अधिक होता है तो सत्ता परिवर्तन होता है। लेकिन पिछले कुछ सालों के मतदान प्रतिशत बढ़ने के बाद भी सत्ता नहीं बदली है।
2010 के बिहार विधानसभा चुनाव में 2005 के मुकाबले 6 प्रतिशत से अधिक मतदान हुआ था और एनडीए की सरकार और अधिक बहुमत के साथ वापस आई थी। इसलिए ऐसा कहना कि बढ़ा हुआ मतदान प्रतिशत सत्ता परिवर्तन का संकेत है तो यह सरासर गलत होगा। आगे बढ़ने से पहले हम एकबार गठबंधन के स्वरुप को जान लें।
2020 में गठबंधन का स्वरुप
2020 बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए से अलग होकर उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी और चिराग पासवान की लोजपा (केवल जेडीयू के सीटों पर) चुनाव लड़ी। चिराग पासवान और उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी के द्वारा वोट काटने के कारण जेडीयू तीसरे नंबर की पार्टी बन गई और 43 सीटों पर सिमट गई। इस चुनाव में मुकेश साहनी की पार्टी VIP एनडीए में थी। वहीं महागठबंधन मुकेश साहनी की पार्टी को छोड़कर इसी स्वरुप में थी।
2025 में गठबंधन का स्वरुप बदला
2025 में एनडीए चिराग पासवान और उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी के आने से मजबूत हुआ। आपको बताते चलें की चिराग पासवान के पास 7% का वोट बैंक है जो उनके कहने पर किसी को भी ट्रांसफर होता है। वहीं उपेंद्र कुशवाहा अपने जाति के आज भी सबसे बड़े नेता हैं। इन दोनों के कारण 2020 में एनडीए खासकर नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू को लगभग 30 सीटों पर हार का सामना करना पड़ा था। इन दोनों के आने से इस चुनाव में एनडीए की स्थिति मजबूत हुई है।
वहीं महागठबंधन में इसबार केवल मुकेश साहनी की पार्टी VIP शामिल हुई। इस पार्टी का वोट बैंक 3-4 प्रतिशत बताया जा रहा है। मुकेश साहनी को महागठबंधन ने उपमुख्यमंत्री का चेहरा घोषित किया है इस कारण इस जाति का बहुमत वोट महागठबंधन में जा सकता है। इसके अलावा गठबंधन के साथी के तौर पर महागठबंधन में कोई वोट जुड़ता हुआ नहीं दिख रहा है।
महिला मतदता बनाम युवा मतदाता

महिला मतदता
इस बार के चुनाव में सबसे अधिक फोकस जिन मतदाताओं पर है, वह है महिला और युवा मतदाता। महिला मतदाता का कारण यह है कि नीतीश कुमार का सुशासन और महिलाओं के लिए खजाना खोलना। साथ में महिला वोटर का पीएम मोदी पर विश्वास। इन कारणों से महिला मतदाता और वृद्ध मतदाता का वोट एनडीए के तरफ जाता हुआ दिख रहा है। साथ ही आपको यह भी ध्यान में रखना होगा कि यह दोनों मतदाता समूह बिहार में ही रहता हैं। और यह वोटर मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र में सारे समीकरणों को ध्वस्त करते हुए अपना कमाल दिखा चुका है।

2020 में 119 सीटों पर महिलाओं ने अधिक वोट किया था जिसमें से एनडीए को 72 सीटों पर जीत मिली थी। वहीं महागठबंधन के खाते में 42 और अन्य के खाते में 5 सीटें गईं थीं।
युवा मतदाता
बिहार विधानसभा चुनाव में पलायन और बेरोजगारी हमेशा से मुद्दा रहा है। 2020 बिहार विधानसभा चुनाव में तेजस्वी यादव ने इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाया था। साथ में दस लाख सरकारी नौकरी देने का वादा किया था। इस पर हर जाति के युवाओं ने विश्वास किया और वोट भी दिया। जिसके कारण राजद सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। महज कुछ वोटों के कारण तेजस्वी यादव सरकार बनाने से चुक गए थे। यहां आपको यह भी याद रखना होगा कि चिराग पासवान और उपेंद्र कुशवाहा के एनडीए से अलग लड़ने पर लगभग 25 सीटों पर राजद को जीत मिली थी।
लेकिन इस बार के विधानसभा चुनाव में थोड़ी स्थिति बदली हुई है। रोजगार और पलायन का मुद्दा इस चुनाव में भी है। लेकिन युवाओं का वह साथ तेजस्वी को मिलता हुआ नहीं दिख रहा है जो 2020 में मिला था। इसका पहला कारण तो तेजस्वी का हर घर नौकरी देने का वादा है। इस वादा पर युवा विश्वास नहीं कर पा रहा और इसे असंभव बताया जा रहा साथ में गंभीरता से भी नहीं लिया जा रहा। युवाओं के एक तबके में तो इसे मजाक तक बताया जा रहा जो 2020 में तेजस्वी के लिए वोट किया था।

जहां तक एनडीए की बात है तो बीजेपी का सीएम बनने की संभावना के बीच उन युवाओं के एक तबके का वोट उसे मिल रहा है इसबार जो उसे 2020 में नहीं मिला था।
2020 विधानसभा चुनाव की तुलना में इस बार एक तरफ महिलाओं का वोट एनडीए की तरफ बढ़ता हुआ दिखाई दे रहा है वहीं दूसरी तरफ युवाओं का वोट घटता हुआ दिखाई दे रहा है महागठंधन में।
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इसके आलावा सभी पार्टियों का कोर वोटर उसके साथ हैं हीं। एक अलग फेक्टर जन सुराज है लेकिन वह सिमित सीटों पर ही है। उसका कारण यह है कि लोग या तो पक्ष में वोट देते हैं या विपक्ष में और जन सुराज इन दोनों में से कोई भी जगह नहीं बना पाया है।









