बिहार विधानसभा चुनाव में अपेक्षित प्रदर्शन न कर पाने के बाद जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर ने सोमवार को पत्रकारों से बातचीत में खुलकर अपनी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने स्वीकार किया कि जनता का भरोसा नहीं जीत पाने की पूरी जिम्मेदारी उनकी है और अब आत्मचिंतन का समय है।
‘साढ़े तीन प्रतिशत वोट मिले, लेकिन इतनी बड़ी भीड़ आई—कुछ तो सही किया होगा’
पीके ने कहा कि पार्टी को केवल करीब साढ़े तीन फीसदी वोट मिले, इसके बावजूद उनकी प्रेस कॉन्फ्रेंस में भारी संख्या में लोगों की मौजूदगी इस बात का संकेत है कि उनके प्रयासों की प्रभावशीलता को जनता ने महसूस किया है। उन्होंने कहा कि वे व्यवस्था परिवर्तन के संकल्प के साथ मैदान में उतरे थे, पर न सत्ता परिवर्तन हो पाया और न ही जन आंदोलन को वह ताकत मिली जिसकी उम्मीद थी।
उन्होंने इसे अपनी व्यक्तिगत विफलता बताते हुए कहा, “मैं जनता का विश्वास नहीं जीत पाया। हम सब सामूहिक रूप से हारे हैं। जो लोग जीते हैं, उन्हें शुभकामनाएं। सरकार अपने वादों पर खरी उतरे, यही उम्मीद है।”
गांधी आश्रम में उपवास करेंगे प्रशांत किशोर
पीके ने बताया कि 20 नवंबर से वे गांधी आश्रम में एक दिन का मौन उपवास करेंगे, जिसे वे आत्मचिंतन और प्रायश्चित का प्रतीक मानते हैं। उन्होंने कहा कि उनके प्रयासों में कमी रही होगी, पर कोई अपराध नहीं किया। “वोट न मिलना गुनाह नहीं है। सिर उठाकर कह सकता हूं कि हमने जाति और धर्म की राजनीति का जहर नहीं फैलाया।”
‘बिहार नहीं छोड़ेंगे, दोगुनी ताकत से फिर लौटेंगे’
चुनावी हार के बावजूद प्रशांत किशोर ने साफ कहा कि उनकी लड़ाई खत्म नहीं हुई है। “बिहार को बदलने की जिद मैंने छोड़ी नहीं है। तीन साल की मेहनत आप देख चुके हैं, अब उससे दोगुनी मेहनत करेंगे। जन सुराज की जीत निश्चित है। अभी चक्रव्यूह से निकलने में देर है, पर हम रुकने वाले नहीं।”
‘चुनाव में 40 हजार करोड़ रुपये खर्च किए गए’
नतीजों पर चर्चा के दौरान पीके ने एनडीए सरकार पर गंभीर आरोप लगाया कि चुनाव से पहले सरकारी तंत्र के जरिए 40 हजार करोड़ रुपये तक जनता में बांटे गए।
उनका आरोप है कि आशा, जीविका दीदियों से लेकर प्रवासी मजदूरों तक को कई तरह की आर्थिक सहायता और लाभ देकर माहौल तैयार किया गया। उन्होंने कहा कि 10 हजार रुपये के लिए लोगों ने वोट नहीं बेचा, बल्कि सरकार ने बड़े स्तर पर संसाधन झोंके।
‘राजनीति से संन्यास का सवाल ही नहीं, कौन-सा पद संभाल रहा था?’
जब उनसे राजनीति छोड़ने की बात पूछी गई तो पीके ने कहा कि वे किसी पद पर थे ही नहीं कि इस्तीफा दें। उन्होंने स्पष्ट कहा कि वे न बिहार छोड़ेंगे और न ही जनता के मुद्दों को उठाना बंद करेंगे। उन्होंने तंज कसते हुए कहा, “सरकार अगर अपने वादे पूरे कर दे तो मैं खुद बिहार छोड़ने को तैयार हूं। दो लाख रुपये देने की बात योजना में लिखी है, उसे लागू करके दिखाएं।”
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पीके ने फिर उठाया बड़ा सवाल — ‘क्या 10 हजार रुपये में वोट खरीदे गए?’
उन्होंने कहा कि नीतीश कुमार की जीत और हार के बीच एक ही सवाल छिपा है—क्या सरकार ने योजना के नाम पर 10 हजार रुपये देकर वोट खरीदे? उन्होंने दावा किया कि गजट नोटिफिकेशन में इसे वन-टाइम पेमेंट नहीं बताया गया है, बल्कि आत्मनिर्भरता के लिए मदद के रूप में 2 लाख रुपये तक देने की बात दर्ज है।









