मध्य पूर्व एक बार फिर बड़े भू-राजनीतिक संकट की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है। ईरान में अंदरूनी हालात लगातार बिगड़ते जा रहे हैं। सड़कों पर लाखों लोग सरकार के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं, वहीं अमेरिका की कड़ी चेतावनियों ने युद्ध की आशंका को और गहरा कर दिया है। अगर हालात सैन्य टकराव तक पहुंचते हैं, तो सवाल सिर्फ ईरान और अमेरिका के बीच जंग का नहीं होगा, बल्कि यह भी तय होगा कि मुस्लिम देश इस संकट में किस ओर झुकते हैं—ईरान के साथ, अमेरिका के साथ या तटस्थ रहकर।
ईरान संकट की जड़ में क्या है?
ईरान वर्षों से अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के दबाव में है। अमेरिका, संयुक्त राष्ट्र और यूरोपीय देशों के प्रतिबंधों ने उसकी अर्थव्यवस्था को कमजोर कर दिया है। महंगाई रिकॉर्ड स्तर पर है, ईरानी रियाल लगातार गिर रहा है और आम नागरिकों की रोजमर्रा की जिंदगी कठिन होती जा रही है। इसी आर्थिक तनाव ने हाल के दिनों में व्यापक विरोध प्रदर्शनों को जन्म दिया।
शुरुआत में ये आंदोलन महंगाई और बेरोजगारी तक सीमित थे, लेकिन धीरे-धीरे यह सत्ता व्यवस्था और सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई के नेतृत्व के खिलाफ खुली चुनौती में बदल गए। पिछले कुछ हफ्तों में हिंसा और दमन की घटनाओं में हजारों लोगों के मारे जाने की खबरों ने हालात को और विस्फोटक बना दिया है।
अमेरिका की चेतावनी और युद्ध की आशंका
इन हालात के बीच अमेरिका की ओर से ईरान को लेकर “कड़े विकल्पों” पर विचार की बात सामने आई है। इससे यह अटकलें तेज हो गई हैं कि अमेरिका और इजरायल मिलकर ईरान पर सैन्य कार्रवाई कर सकते हैं। इस संभावित टकराव ने पूरे मध्य पूर्व को सतर्क कर दिया है। मुस्लिम देशों के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि युद्ध की स्थिति में वे किस पक्ष में खड़े होंगे या फिर दूरी बनाए रखेंगे।
क्या मुस्लिम देश एकजुट होंगे?
विश्लेषकों के अनुसार मुस्लिम दुनिया किसी एक साझा रुख पर नहीं पहुंचेगी। जैसे गाजा संघर्ष के दौरान देखा गया, वैसे ही इस बार भी ज्यादातर देश अपने-अपने राष्ट्रीय हितों, सुरक्षा चिंताओं और अंतरराष्ट्रीय रिश्तों को ध्यान में रखते हुए संतुलन की नीति अपनाएंगे। खुला सैन्य समर्थन देने के बजाय कई देश तटस्थता या कूटनीतिक बयानबाजी तक सीमित रह सकते हैं।
कतर: रणनीतिक साझेदार, लेकिन सतर्क
कतर अमेरिका का अहम सैन्य सहयोगी है और यहां स्थित अल उदीद एयर बेस अमेरिका के सबसे बड़े विदेशी सैन्य अड्डों में से एक है। इसके बावजूद माना जा रहा है कि कतर सीधे तौर पर किसी युद्ध में शामिल होने से बचेगा। संभव है कि वह अपने सैन्य अड्डों के इस्तेमाल को लेकर सीमाएं तय करे और खुद को तटस्थ दिखाने की कोशिश करे। कतर की प्राथमिकता क्षेत्रीय अस्थिरता से बचना होगी।
इराक क्यों बनाए रखेगा दूरी?
इराक की स्थिति बेहद नाजुक है। एक ओर वहां अमेरिकी प्रभाव को लेकर नाराजगी है, तो दूसरी ओर कई राजनीतिक और धार्मिक गुट ईरान के करीब माने जाते हैं। ऐसे में बगदाद किसी भी ऐसे टकराव से दूर रहना चाहेगा, जो देश को फिर से हिंसा और अस्थिरता की ओर धकेल दे।
तुर्किए की दोहरी चुनौती
तुर्किए अक्सर अमेरिकी और इजरायली नीतियों की आलोचना करता रहा है और फिलिस्तीन के मुद्दे पर उसने खुलकर इजरायल का विरोध किया है। यदि इजरायल अकेले ईरान पर हमला करता है, तो अंकारा राजनीतिक स्तर पर ईरान के समर्थन में बयान दे सकता है। लेकिन नाटो सदस्य होने और अमेरिका से गहरे सैन्य संबंधों के कारण तुर्किए सीधे युद्ध में उतरने से बचेगा और मध्यस्थ की भूमिका निभाने की कोशिश कर सकता है।
पाकिस्तान: संतुलन और कूटनीति
पाकिस्तान पहले से ही आर्थिक संकट और सुरक्षा चुनौतियों से जूझ रहा है। ऐसे में वह किसी नए अंतरराष्ट्रीय सैन्य संघर्ष में शामिल होने का जोखिम नहीं उठाएगा। संभावना है कि पाकिस्तान संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय मंचों पर शांति, संयम और बातचीत की अपील तक सीमित रहेगा।
यूएई: व्यापार और सुरक्षा के बीच संतुलन
यूएई का रुख बेहद सतर्क रहने वाला हो सकता है। दुबई ईरान के साथ बड़े पैमाने पर व्यापार करता है, जो उसे खुलकर विरोध करने से रोकता है। वहीं सुरक्षा के लिहाज से यूएई अमेरिका और सऊदी अरब का करीबी सहयोगी है। युद्ध की स्थिति में वह सीधे सैन्य कार्रवाई से बचेगा, लेकिन सीमित लॉजिस्टिक या खुफिया सहयोग संभव है।
कुवैत की पारंपरिक तटस्थता
कुवैत क्षेत्रीय संघर्षों में संतुलन बनाए रखने के लिए जाना जाता है। ईरान के साथ सामाजिक-सांस्कृतिक रिश्तों और अमेरिका-सऊदी अरब के साथ रणनीतिक संबंधों के बीच वह किसी एक पक्ष का खुला समर्थन करने से बच सकता है। कुवैत की कोशिश मध्यस्थता और तनाव कम करने की होगी।
सऊदी अरब की जटिल स्थिति
सऊदी अरब लंबे समय से ईरान को क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वी मानता रहा है, लेकिन हाल के वर्षों में दोनों देशों के रिश्तों में कुछ सुधार भी हुआ है। ऐसे में अगर युद्ध होता है, तो सऊदी अरब सीधे सैन्य टकराव से बचने की कोशिश कर सकता है, भले ही वह अमेरिका का करीबी सहयोगी क्यों न हो।
ओमान: शांति का सेतु
ओमान को खाड़ी क्षेत्र का सबसे संतुलित देश माना जाता है। अतीत में उसने ईरान और पश्चिमी देशों के बीच कई बार मध्यस्थ की भूमिका निभाई है। किसी संभावित युद्ध की स्थिति में ओमान का रुख शांति और बातचीत तक सीमित रहने की संभावना है।
मिस्र और जॉर्डन: सुरक्षा सर्वोपरि
मिस्र अमेरिका का पुराना रणनीतिक साझेदार है, लेकिन उसकी प्राथमिकताएं गाजा, सिनाई प्रायद्वीप और स्वेज नहर की सुरक्षा हैं। इसलिए वह किसी बड़े क्षेत्रीय युद्ध से दूरी बनाए रखेगा। वहीं जॉर्डन, जो रणनीतिक रूप से अहम लेकिन छोटा देश है, अपने हवाई क्षेत्र और सीमाओं की सुरक्षा पर ध्यान देगा और सीधे सैन्य भागीदारी से बचेगा।
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अगर ईरान पर हमला होता है, तो मुस्लिम दुनिया एकजुट होकर किसी एक पक्ष के साथ खड़ी होती नजर नहीं आएगी। ज्यादातर देश तटस्थता, कूटनीति और अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देंगे। यानी यह संघर्ष सिर्फ सैन्य नहीं होगा, बल्कि मध्य पूर्व की राजनीति में संतुलन और रणनीति की एक बड़ी परीक्षा भी साबित हो सकता है।









