बिहार विधानसभा चुनाव 2025 दो चरणों में 6 और 11 नवंबर को संपन्न होंगे, और 14 नवंबर को परिणाम घोषित किए जाएंगे। चुनावी तैयारियां जोरों पर हैं, लेकिन इस बीच कई सीटों से प्रत्याशियों का नामांकन रद्द होने की खबरें सामने आ रही हैं। अब तक विभिन्न राजनीतिक दलों के दर्जनों उम्मीदवारों का नामांकन विभिन्न कारणों से रद्द कर दिया गया है, जिससे सियासी गलियारों में हलचल तेज हो गई है।
नामांकन रद्द की लहर, कई बड़ी पार्टियों को झटका
अब तक जो जानकारी सामने आई है, उसके मुताबिक नामांकन रद्द होने का असर VIP, RJD, LJP-R, जन सुराज, बसपा, JJD जैसी पार्टियों पर पड़ा है। कई निर्दलीय और छोटे दलों के उम्मीदवार भी इसकी चपेट में आए हैं।
किन-किन सीटों से रद्द हुए नामांकन?
सुगौली (मोतिहारी) — विकासशील इंसान पार्टी (VIP) के प्रत्याशी शशि भूषण सिंह का नामांकन रद्द।
मढ़ौरा (छपरा) — लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) की प्रत्याशी सीमा सिंह का नामांकन निरस्त।
मोहनिया — राजद की उम्मीदवार श्वेता सुमन का नामांकन रद्द हुआ, हालांकि इसकी पुष्टि निर्वाचन आयोग की ओर से नहीं, प्रत्याशी के दावे पर आधारित है।
वाल्मीकिनगर (पश्चिम चंपारण) — जन सुराज पार्टी के दीर्घ नारायण प्रसाद का नामांकन खारिज।
रामगढ़ — राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी के मनीष तिवारी का नामांकन रद्द।
लालगंज (हाजीपुर) — रालोजपा के दिवंगत नेता राकेश पासवान की पत्नी सीमा सुंदरी देवी का नामांकन खारिज।
चिरैया — रालोजपा के सलाउद्दीन और बसपा के बिंदेश्वरी राम दोनों का नामांकन निरस्त।
डेहरी (रोहतास) — बसपा के धनजी कुमार और जनशक्ति जनता दल (तेज प्रताप यादव की पार्टी) की सुनीता देवी का नामांकन रद्द।
रक्सौल — बसपा के गौतम कुमार का नामांकन भी रद्द कर दिया गया।
कारण क्या हैं?
नामांकन रद्द होने के पीछे सामान्यतः कागजी त्रुटियां, प्रस्तावकों की वैधता में गड़बड़ी, नामांकन पत्र में जानकारी अधूरी होना, या नामांकन शपथ पत्र में विसंगतियां जैसे कारण होते हैं। निर्वाचन आयोग प्रत्येक नामांकन की विधिवत जांच करता है और त्रुटिपूर्ण पाए जाने पर उसे रद्द कर देता है।
हालांकि, कुछ प्रत्याशियों और दलों ने इसे राजनीतिक साजिश करार देते हुए जांच की मांग की है।
चुनावी समीकरणों पर असर
इन नामांकन रद्दियों से कई सीटों पर चुनावी समीकरण बदल सकते हैं। खासकर जहां बहुकोणीय मुकाबले की संभावना थी, वहां अब त्रिकोणीय या सीधे मुकाबले का रास्ता साफ होता नजर आ रहा है। छोटे दलों और निर्दलीय प्रत्याशियों की अनुपस्थिति का सीधा फायदा बड़े दलों को मिल सकता है।
अब आगे क्या?
नामांकन रद्द होने के बाद प्रत्याशियों के पास अपील करने का विकल्प होता है, लेकिन यह प्रक्रिया सीमित समय में पूरी करनी होती है। अब जबकि चुनाव की तारीखें नजदीक हैं, राजनीतिक दलों के लिए यह समय रणनीति में फेरबदल का है।
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बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की सरगर्मी के बीच नामांकन रद्द होने की घटनाएं चुनावी माहौल को और अधिक संवेदनशील बना रही हैं। जहां कुछ उम्मीदवार कानूनी लड़ाई की तैयारी में हैं, वहीं बाकी प्रत्याशी अब बदली हुई परिस्थिति में चुनावी रणनीति को नए सिरे से गढ़ने में जुट गए हैं। चुनाव आयोग की पारदर्शिता और निष्पक्षता इस दौर में एक बार फिर केंद्र में है।










