उत्तराखंड हाई कोर्ट ने एक अहम आदेश में राज्य निर्वाचन आयोग के उस निर्देश पर रोक लगा दी है, जिसमें दो अलग-अलग मतदाता सूचियों—नगर निकाय और ग्राम पंचायत—में नाम होने पर भी उम्मीदवारों को त्रिस्तरीय उत्तराखंड पंचायत चुनाव में मतदान और चुनाव लड़ने की अनुमति दी गई थी। कोर्ट ने यह स्पष्ट किया है कि ऐसा करना पंचायती राज अधिनियम के विपरीत है।
क्या है मामला?
गढ़वाल निवासी शक्ति सिंह बर्त्वाल की ओर से दायर जनहित याचिका में यह सवाल उठाया गया था कि राज्य के 12 जिलों में ऐसे कई प्रत्याशी हैं जिनके नाम एक साथ नगर निकाय और ग्राम पंचायत की मतदाता सूची में दर्ज हैं। कुछ रिटर्निंग अधिकारियों ने ऐसे प्रत्याशियों के नामांकन रद्द कर दिए, जबकि कुछ ने उन्हें स्वीकृति दे दी, जिससे चुनाव प्रक्रिया में असमानता पैदा हो गई।
याचिकाकर्ता ने यह भी तर्क दिया कि भारत के किसी भी राज्य में एक मतदाता का दो मतदाता सूचियों में नाम होना अपराध की श्रेणी में आता है। ऐसे में उत्तराखंड में इस पर रोक न लगाना गंभीर चूक है।
हाई कोर्ट की टिप्पणी
मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति जी नरेंद्र और न्यायमूर्ति आलोक मेहरा की खंडपीठ ने कहा कि भले ही वर्तमान पंचायत चुनाव की नामांकन प्रक्रिया पूरी हो चुकी हो, फिर भी दो मतदाता सूची में नाम वाले व्यक्ति का चुनाव लड़ना कानून का उल्लंघन है।

हालांकि कोर्ट ने वर्तमान चुनाव प्रक्रिया में सीधे हस्तक्षेप नहीं किया है, लेकिन भविष्य में इस प्रकार के मामलों को लेकर स्पष्ट आदेश दे दिया है।
आयोग की भूमिका पर सवाल
शक्ति सिंह बर्त्वाल ने यह मामला पहले राज्य निर्वाचन आयोग के समक्ष भी उठाया था और 7 व 8 जुलाई को मुख्य निर्वाचन अधिकारी को पत्र भेजकर स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करने की मांग की थी। लेकिन आयोग की ओर से मिली प्रतिक्रिया से असंतुष्ट होकर उन्होंने हाई कोर्ट की शरण ली।
पक्षकारों की प्रतिक्रिया
- याचिकाकर्ता के अधिवक्ता अभिजय नेगी ने कहा कि कोर्ट के आदेश के बाद अब दोनों सूचियों में नाम वाले प्रत्याशी स्वतः अयोग्य माने जाएंगे। यदि आयोग ने इसे गंभीरता से नहीं लिया तो यह अवमानना का मामला बन सकता है।
- आयोग की ओर से अधिवक्ता संजय भट्ट ने कहा कि कोर्ट ने वर्तमान चुनाव प्रक्रिया में हस्तक्षेप नहीं किया है, इसलिए फिलहाल चुनावों पर असर नहीं पड़ेगा। लेकिन भविष्य में यह आदेश प्रभावी होगा। आदेश की प्रति मिलने के बाद आयोग कानूनी पहलुओं पर विचार करेगा।
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उत्तराखंड हाई कोर्ट का यह फैसला राज्य में निर्वाचन की नैतिकता और पारदर्शिता को मजबूत करने वाला कदम माना जा रहा है। यह आदेश केवल एक कानूनी तकनीकीता नहीं, बल्कि लोकतंत्र की जड़ों को और मजबूत करने की पहल है। अब देखना होगा कि राज्य निर्वाचन आयोग इस फैसले पर कैसे अमल करता है और आगे के चुनावों में इसे कैसे लागू किया जाता है।








